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समय की कमी: छात्रों के लिए एक डिजिटल चुनौती

आज के तेज़ और अत्यधिक जुड़े हुए दौर में छात्रों के बीच समय की कमी एक गंभीर समस्या बनती जा रही है। यह इसलिए नहीं कि समय कम हो गया है, बल्कि इसलिए कि ध्यान लगातार बंट रहा है। हाल के अवलोकनों के अनुसार, छात्र प्रतिदिन लगभग 4 से 6 घंटे डिजिटल उपकरणों पर बिताते हैं , जिनमें से करीब 30–40% समय गैर उत्पादक गतिविधियों जैसे सोशल मीडिया स्क्रॉलिंग और शॉर्ट वीडियो देखने में व्यर्थ हो जाता है। वहीं दूसरी ओर, शैक्षणिक दबाव इतना बढ़ चुका है कि छात्रों को 6–8 घंटे स्कूल और कोचिंग में देने पड़ते हैं, जिससे पुनरावृत्ति, आराम और व्यक्तिगत विकास के लिए बहुत कम समय बचता है। यह असंतुलन एक गहरी समस्या की ओर इशारा करता है। छात्रों के पास समय की कमी नहीं है, बल्कि वे उसके उपयोग पर नियंत्रण खो रहे हैं।

इस बदलाव में डिजिटल प्लेटफॉर्म की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। आज के अधिकांश ऐप्स ऐसे एल्गोरिदम पर आधारित हैं जो कि उपयोगकर्ता की आदतों को समझकर उन्हें लंबे समय तक जोड़े रखने के लिए सामग्री प्रस्तुत करते हैं। जो कुछ मिनट का ब्रेक लगता है, वह कब घंटों में बदल जाता है, इसका पता ही नहीं चलता। तकनीकी विशेषज्ञ ट्रिस्टन हैरिस के अनुसार, ये प्लेटफॉर्म मानव ध्यान के लिए प्रतिस्पर्धा करते हैं। छात्रों के लिए इसका मतलब है कि उनका कीमती समय अनजाने में ही खर्च हो जाता है, जिससे उन्हें हमेशा लगता है कि समय कम पड़ रहा है।

इस स्थिति को समझने के लिए रिया का उदाहरण महत्वपूर्ण है, जो एक हाई स्कूल की छात्रा है और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रही थी। पूरे दिन पढ़ाई और कोचिंग के बावजूद वह अपने असाइनमेंट समय पर पूरा नहीं कर पाती थी। जब उसने अपने दिनचर्या का विश्लेषण किया, तो पाया कि वह रोज़ाना लगभग 2.5 घंटे मोबाइल पर बिता रही थी। स्क्रीन टाइम कम करने और एक निर्धारित समय-सारणी अपनाने के बाद कुछ ही हफ्तों में उसकी उत्पादकता बढ़ी और तनाव कम हुआ। यह उदाहरण आज के कई छात्रों की वास्तविकता को दर्शाता है

सर्वेक्षण भी इसी प्रवृत्ति की पुष्टि करते हैं। 60% से अधिक छात्र नियमित रूप से टालमटोल (procrastination) करते हैं, जबकि लगभग 50% छात्र खराब समय प्रबंधन के कारण खुद को तनावग्रस्त महसूस करते हैं। शोध यह भी बताते हैं कि जो छात्र एक व्यवस्थित अध्ययन योजना का पालन करते हैं, वे अन्य छात्रों की तुलना में 20–25% बेहतर प्रदर्शन करते हैं। यह स्पष्ट करता है कि समय प्रबंधन और सफलता के बीच सीधा संबंध है, लेकिन डिजिटल विचलनों के कारण इसे बनाए रखना कठिन होता जा रहा है।

अत्यधिक डिजिटल उपयोग का एक बड़ा प्रभाव ध्यान केंद्रित करने की क्षमता पर पड़ता है। लगातार छोटे और मनोरंजक कंटेंट देखने से दिमाग लंबे और जटिल कार्यों पर ध्यान लगाने में कमजोर हो जाता है। छात्र तुरंत संतुष्टि पाने की आदत विकसित कर लेते हैं, जिससे पढ़ाई कठिन और बोझिल लगने लगती है। इसका परिणाम होता है देरी, अंतिम समय का दबाव और बढ़ता हुआ तनाव, जो समय की कमी की भावना को और मजबूत करता है।

इस समस्या का समाधान जागरूकता और सही प्रयास में है। छात्रों को यह समझना होगा कि हर स्क्रीन टाइम उपयोगी नहीं होता और छोटे-छोटे बदलाव बड़े परिणाम ला सकते हैं। अनावश्यक मोबाइल उपयोग को सीमित करना, प्राथमिकताओं को स्पष्ट करना और दैनिक योजना बनाना संतुलन स्थापित करने में मदद कर सकता है। यदि कोई छात्र प्रतिदिन केवल एक घंटा भी डिजिटल विचलन कम कर दे, तो वह साल भर में 365 से अधिक अतिरिक्त उत्पादक घंटे प्राप्त कर सकता है। अंततः, समय की कमी वास्तविक नहीं है बल्किसमस्या उसके गलत उपयोग की है। यदि छात्र अपने ध्यान पर नियंत्रण पा लें, तो समय उनके लिए तनाव का कारण नहीं, बल्कि सफलता का एक मजबूत साधन बन सकता है।

लेखक – अभय प्रताप सिंह संस्थापक – लेखनशाला रायबरेली

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