51 कुंडी महायज्ञ के अंतिम दिन हजारों लोगों ने दी पूर्णाहुति

Raebareli Uttar Pradesh

हुए कई संस्कार

भंडारे में लोगों ने प्रसाद ग्रहण किया

दिलीप मिश्रा

सलोन ,रायबरेली ।अखिल विश्व गायत्री परिवार शांतिकुंज हरिद्वार के मार्गदर्शन में क्षेत्र के लंमुई गांव स्थित गायत्री चेतना केंद्र में हो रहे 51 कुंडीय गायत्री महायज्ञ एवं प्रज्ञा पुराण कथा का चौथे दिन पूर्णाहुति के साथ यज्ञ का समापन हो गया ।जिसमें हजारों की संख्या में भक्तों ने पूर्णाहुति दी। ग्रामीणों ने दक्षिणा में अपनी बुराई दी और अच्छाई का संकल्प लिया ।मातृशक्ति और देव कन्याओं ने दीप प्रज्वलित किए ।पुंसवन, विद्यारंभ ,यगोपवित और दीक्षा संस्कार हुए। गौ ,गंगा ,गायत्री ,गीता यह भारत की शान पुनीता के जयघोष गूंजते रहे। मां गायत्री के जयकारे लगे ।लोगों ने भंडारे में प्रसाद भी ग्रहण किया। महा यज्ञ समारोह के अंतिम दिन यज्ञशाला में जनसैलाब उमड़ा रहा 51 कुंडी यज्ञ शाला में कई चक्र में यज्ञ का कार्यक्रम हुआ जिस में मौजूद सभी भक्तों ने यज्ञ किया उसके बाद परिक्रमा कर लोक कल्याण की कामना की। शांतिकुंज हरिद्वार से आए टोली नायक नमो नारायण पांडे ने कहा कि मनुष्यता पाने के लिए श्रेष्ठ ज्ञान अर्जित कर संस्कारवान बने शुभ विचारों से आध्यात्मिक पर करता लाएं गृहस्थ एक तपोवन है जो चार आश्रमों से श्रेष्ठतम है मनुज देवता बने बने यह धरती स्वर्ग समान प्रज्ञा गीत का श्रवण कराया। यज्ञ में पुंसवन ,अन्नप्राशन ,नामकरण ,विद्यारंभ दीक्षा और जन्म दिवस और विवाह दिवस संस्कार भी हुए। रामेश्वर यादव  ने नियमित योगाभ्यास कराया। यज्ञ के समापन पर भक्तों ने भंडारे में प्रसाद ग्रहण किया। मानव मे देवत्व के उदय व धरती पर स्वर्ग के अवतरण हेतु युग-ऋषि का अभिनव प्रयोग क्षेत्र की खुशहाली व समृद्धशाली हेतु किया गया।जिसमे गायत्री चेतना केन्द्र लमुई के सभी प्रमुख  संगमलाल शुक्ला, त्रिवेणी प्रसाद शुक्ला, रामेश्वर प्रसाद यादव, ओमप्रकाश ओझा, रविन्द्र तिवारी,  कुसुम मिश्रा, शिव प्रसाद शुक्ला , बृजमोहन साहू,  दिनेश प्रजापति, हरिराम यादव, रामसंजीवन गौड़, सन्तोष कुमार शुक्ला व कार्यक्रम संयोजक,जिला समन्वयक वी.बी सिंह आदि अन्य कई हजारों की संख्या में नजदीकी गाँवों तथा नजदीकी जिला रायबरेली,अमेठी,प्रतापगढ़ के लोगों ने भागीदारी की।ग्रामीण आंचल में अब तक का यह पहला दिव्य और भव्य आयोजन है।जो भविष्य में भारतीय संस्कृति के उत्थान व संस्कार परम्पराओं को पुनर्जीवित करने में मील का पत्थर साबित होगा।

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