चुनाव और चुनावी घोषणा पत्र -: सम्पादकीय

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हमारे देश मे कही न कही कोई न कोई चुनाव तो होता ही रहता है, और उन चुनावो के मद्देनजर हर राजनैतिक पार्टिया अपना एक चुनावी घोषणा पत्र भी जारी करती है ।
घोषणा पत्र एक प्रकार का पार्टियों का प्रमाणिक दस्तावेज है जिसमे वह सारे वो कार्य दर्ज करवाती है जो वह जीतने के बाद पूर्ण करेगी, आज कल भारतीय राजनीति में चुनावी घोषणा पत्रो का बड़ा बोल बाला है रहता है, जिस भी पार्टी को देख लो वो लोक लुभावन वादे करने में पीछे नही हटती, बहुतेरे वादे तो ऐसे होते है कि सरकारों के पूरे कार्यकाल समाप्त हो जाते है और कभी कभी तो कार्यकाल पर कार्यकाल निकल जाते है पर वादे है कि पूरा होने का नाम नही लेते और वो वादे घोषणा पत्र के किसी कोने में पड़े पड़े दम तोड़ते ही नजर आते है ।
ये हाल किसी एक पार्टी का नही अपितु सभी पार्टियों का यही हाल है, देश का दुर्भाग्य है कि इस पर न तो जनता (सिवाय अगले चुनाव के इंतजार करने) और ना ही कानून कुछ कर सकता है , क्योंकि ऐसा कोई कानून ही नही है देश मे की अगर राजनैतिक पार्टिया अपने किये वादे जो कि, चुनावी घोषणा पत्र में लिखित दस्तावेज के तौर पर उपलब्ध है, को पूरा ना करे तो उसपर कार्यवाही हो !!
…यहाँ एक बात गौर करने वाली है कि अगर हम किसी और क्षेत्र की ओर देखते है तो वहा पर जवाबदेही तय होती है और कभी कभी तो दंडात्मक कार्यवाही भी होती है फिर चाहे वो किसी ऑफिस का कर्मचारी हो, अफसर हो, बाबू हो या अन्य किसी भी पद पर हो ।।
तो फिर राजनैतिक पार्टियों को इतनी छूट क्यो ? …
इन पार्टीयो के लिए घोषणा पत्र महज एक सत्ताप्राप्ति के लिए झूठ का पुलिंदा बन नही रह सकता जिसे ये पार्टिया जनता को लुभाने के लिए रात दिन एक कर के चुनावों में जोर शोर से प्रचारित करते है और दूसरे से श्रेष्ठ होने का बखान करते नही थकते ।
अभी हाल के दिनों मैं उत्तर प्रदेश में चुनावो के दौरान एक दल ने वादा किया किया कि जब वो सत्ता में आएगी तो किसानों का कर्ज माफ होगा ये बात उसके घोषणा पत्र में बिना किसी किन्तु – परन्तु के लिखी थी पर जब सरकार बन गयी तो उसने इसमे इतने क्लाज(शर्ते) लगा दी कि सभी किसानों की कर्ज़ माफी संभव ना हो सकी, इस तरह के ढेरो उदाहरण है ।
इसी तरह पिछली की सरकारों ने भी किया जब पिछला उत्तर प्रदेश का चुनाव हो रहा था तब एक पार्टी ने वादा किया कि जब हम सत्ता आएंगे तो सभी इंटर पास को लैपटॉप और हाइस्कूल पास को टैबलेट देंगे पर , जब सरकार बनी तो करोङो बच्चो ने परीक्षाये पास की पर लैपटॉप सिर्फ २५ लाख (लगभग) बांटे गए और टैबलेट तो बांटे ही नही गए, जबकि घोषणा पत्र में कुछ और ही था यही हाल बेरोजगारी भत्ता का रहा ।।
इसलिये अगर पार्टियां अपने घोषणा पत्र पर को लेकर जनता के बीच जाती है और इसे पूरा करने का दम्भ भरती है तो क्यो न सभी पार्टियों के घोषणा पत्रो को एक कानूनी मान्यता देकर इसे कानून के तहत क्रियान्वित किया जाए और उस पर अक्षरशः अमल हो सके ।
 पार्टियो को खुद की जवाबदेही तय करने के लिए आगे आना चाहिए, जिस प्रकार दूसरी जगहों पर कार्यवाही का प्रावधान है उसी प्रकार पार्टीयो पर भी अपने घोषणा पत्र को अपने कार्यकाल के दौरान पूरा ना कर पाने पर दंड का प्रावधान सुनिश्चित हो…..
इससे नेताओ व पार्टियों में लोक लुभावन जो पूर्ण ना किये जा सकने वाले वादे होंगे, उनको करने में कमी आएगी और विकाश भी होगा, जनता भ्रमित कम होगी तथा पार्टियां जनता के हित को सर्वोपरि रख के चुनाव सुधार की दिशा में अग्रसर होंगी ।
आशीष मिश्रा की कलम से 🖋

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