हलषष्ठी,हलछठ पर स्त्रियां अपने संतान की दीर्घायु और स्वास्थ्य के लिए रखती हैं ब्रत

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सन्दीप मिश्रा

रायबरेली। जन्माष्टमी से दो दिन पहले हलषष्ठी, हरछठ या ललही छठ का त्योहार मनाया जाता है। जिसके बारे में व्रती महिलाओं की अलग-अलग राय है लेकिन सबका कहना है कि यह पुत्र की लंबी आयु के लिए रखा जाता है। एक मान्यता के अनुसार यह व्रत भादों कृष्ण पक्ष की षष्ठी को मनाया जाता है। इसी दिन श्री कृष्ण के बड़े भाई बलराम का जन्म हुआ था। दो दिन पहले कृष्ण के बड़े भाई बलराम जी का जन्मोत्सव मनाया जाता है। जिसे हलषष्ठी-हरछठ के नाम से जाना जाता है। पूर्वी हिस्से में इस त्योहार को ललही छठ भी कहते हैं। हलषष्ठी, हरछठ यह व्रत स्त्रियां अपने संतान की दीर्घ आयु और स्वस्थ्य के लिए करती हैं। इस व्रत से जुड़ी तमाम कहानियां भी प्रचलित है जो महिलाएं व्रत और पूजा करती है जरुर सुनती है। कहा जाता है कि पुत्र प्राप्ती के लिए भी इस दिन जो महिलाएं व्रत की कथा सुनती है उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ती होती है। इस दिन हलषष्ठी माता की भी पूजा की जाती है। ये तो सबको बता है लेकिन आज हम व्रत की कहानियों को जाएंगे। जो व्रती महिलाएं सुनती हैं। जब कंस को पता चला की वासुदेव और देवकी की संतान उसकी मृत्यु का कारण बनेंगी तो उसने उन्हे कारागार में डाल दिया और उसकी सभी 6 जन्मी संतानों वध कर डाला। देवकी को जब सांतवा पुत्र होना था तब उनकी रक्षा के लिए नारद मुनी ने उन्हे हलष्ठी माता की व्रत करने की सलाह दी। जिससे उनका पुत्र कंस के कोप से सुरक्षीत हो जाए। देवकी ने Hal Sasthi Vrat किया। जिसके प्रभाव से भगवान ने योगमाना से कह कर देवकी के गर्भ में पल रहे बच्चे को वासुदेव की बड़ी रानी के गर्भ में स्थानांतरित कर दिया जिससे कंस को भी धोखा हो गया और उसने समझा देवकी का संतवा पुत्र जिंदा नहीं हैं। उधर रोहिणी के गर्भ से भगवान बलराम का जन्म हुआ। इसके बाद देवकी के गर्भ से आठवें पुत्र के रुप में श्री कृष्ण का जन्म हुआ। देवकी के व्रत करने से दोनों पुत्रों की रक्षा हुई।

व्रत करने वाली महिलाओं के अनुसार प्राचीन काल में एक ग्वालिन थी। वह नगर में घूम-घूमकर दूध-दही बेचती थी। वह मां बनने वाली थी और उसका प्रसवकाल भी पास आ रहा था। एक ओर वह प्रसव से व्याकुल थी तो दूसरी ओर उसे अपने दूध-दही बेचने की चिंता थी। उसने सोचा कि यदि प्रसव हो गया तो गौ-रस यूं ही पड़ा रह जाएगा। यह सोचकर उसने दूध-दही को बेचने चल दी किन्तु कुछ दूर पहुंचने पर उसे असहनीय प्रसव पीड़ा हुई। वह एक झरबेरी की ओट में चली गई और वहां एक बच्चे को जन्म दिया। बच्चा स्वस्थ्य था उसके बाद वह नवजात को वहीं छोड़कर पास के गांवों में दूध-दही बेचने चली गई।
संयोग से उस दिन हल षष्ठी थी। गाय-भैंस के मिश्रित दूध को केवल भैंस का दूध बताकर उसने सीधे-सादे गांव वालों में बेच दिया। उधर जिस झरबेरी के नीचे उसने बच्चे को छोड़ा था, उसके पास से ही एख किसान खेत में हल जोत रहा था। अचानक हल का फल नवजात बालक को लग गया और वह मर गया।
कुछ देर बाद ग्वालिन वापस आई तो बच्चे की ऐसी दशा देखकर उसे समझते देर नहीं लगी कि यह सब उसके पाप की सजा है। वह सोचने लगी कि आज हलषष्ठी है और उसने झूठ बोलकर गाय का दूध न बेचा होता और गांव की स्त्रियों का धर्म भ्रष्ट न किया होता तो उसके बच्चे की यह दशा न होती।
दरअसल हलषष्ठी के व्रत में गाय के दूध की चीजें मना होती हैं। अतः मुझे लौटकर सब बातें गांव वालों को बताकर प्रायश्चित करना चाहिए। अब वह दुबारा गली-गली घूमकर रो-रो कर अपनी गलती की माफी मांगने लगी। तब स्त्रियों ने उस पर रहम खाकर उसे क्षमा कर दिया और आशीर्वाद दिया।
इसके बाद सभी स्त्रियों उसके साथ उसके पुत्र को देखने खेत में पहुंची तो हैरान रह गईं कि वहां उसका पुत्र जीवित अवस्था में पड़ा है। तभी उसने स्वार्थ के लिए झूठ बोलने को ब्रह्म हत्या के समान समझा और कभी झूठ न बोलने का प्रण कर लिया।

क्या नहीं खाना चाहिए
इस दिन बलराम जी का जन्मोत्सव मनाया जाता है इसलिए खेत में उगे हुए या जोत कर उगाए गए अनाजों और सब्जियों को नहीं खाया जाता। क्योंकि हल बलराम जी का अस्त्र है। साथ ही गाय का दूध, दही, घी ये उससे बने किसी भी वस्तु को खाने की मनाही होती है। इसलिए महिलाएं इस दिन तालाब में उगे पसही/तिन्नी का चावल/पचहर के चावल खाकर व्रत रखती हैं। इस दिन महिलाएं भैंस का दूध ,घी व दही इस्तेमाल करती है।
कैसे करें पूजा-
इस व्रत में महुआ के दातुन से दांत साफ किया जाता है। शाम के समय पूजा के लिये हरछ्ठ मिट्टी की बेदी बनाई जाती है। हरछठ में झरबेरी, कुश और पलास तीनों की एक-एक डालियां एक साथ बांधी जाती है। जमीन को मिट्टी से लीपकर वहां पर चौक बनाया जाता है। उसके बाद हरछ्ठ को वहीं पर लगा देते हैं। सबसे पहले कच्चे जनेउ का सूत हरछठ को पहनाते हैं। फल आदि का प्रसाद चढ़ाने के बाद कथा सुनी जाती है

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