गाँव लौटे कामगारों की आजीविका का अर्थशास्त्र: अतुल शर्मा

Raebareli Uttar Pradesh

प्रमोद राही

“जननी जन्मभूमिश्च

लखनऊ। स्वर्गादापिगरियशी” ऐसा जब मातृभूमि के संदर्भ में कहा गया और कहा जाता है उसका व्यापक अर्थ-संदर्भ है। जिस तरह से शहरी कामगारों का गाँवों की ओर पलायन हुआ वह असाधारण है। ऐसा पलायन भारत-पाक विभाजन के बाद पहली बार देखा गया कि इतनी बड़ी संख्या में लोगों का एक जगह से दूसरी जगह पलायन हुआ। लेकिन इस बीच जो चीज महत्वपूर्ण है वह यह कि संकट के इस समय में आम जनमानस में अपने गाँव लौटने की जैसी बेताबी दिखी, उससे आज के विकसित भारत की छिपी हुई सच्चाई बाहर आ गई। कोरोना महामारी ने शहरों में जैसा भय और अविश्वास का माहौल बनाया उससे शहरों में काम करने के लिए आने वाले लोगों का शहरों के प्रति न सिर्फ विश्वास कम किया, बल्कि एक बार फिर भारत के गाँवों पर लोगों का विश्वास दृढ़ हुआ। निरंतर मेहनत और खून-पसीने से जिस शहर को शहर कहलाने लायक चमकाकर मजदूरों ने सजाया-संवारा, महामारी के समय में वही शहर इन कामगारों को भय दिखाने लगे। कोरोना के भय ने कामगारों के मन में जिस तरह से ग्रामीण क्षेत्रों में पलायन की बात आयी, उससे यह संकेत मिल गया कि अभी भी आम जनमानस के विश्वास के केंद्र भारत के गाँव ही हैं। मजदूरों ने गाँव पहुँचने के लिए वह हर प्रयास किया जो वे अधिकतम कर सकते थे। कुछ पूर्णबंदी से पहले तो कुछ पूर्णबंदी के बाद गाँव पहुंचे। जबकि सरकार की ओर से इन मजदूरों को जहाँ थे वहीं रोकने की हरसंभव कोशिश भी होती रही। अंततः सरकारों को भी इन कामगारों की जिजीविषा के आगे अपनी राह बदलनी पड़ी और देश के अलग-अलग हिस्सों से मजदूरों को श्रमिक विशेष ट्रेन तथा बस चलाकर उन्हें उनके प्रदेश, फिर उन्हें उनके गाँव तक पहुंचाया गया। इसके बाद जो सबसे बड़ा सवाल उठता है कि गाँव आने के बाद इन मजदूरों का क्या होगा? कैसे चलेगी इनकी रोजी-रोटी? कौन और किस तरह से इन्हें काम देगा? जिसक सबसे पहला जवाब उत्तर प्रदेश की सरकार ने श्रमिक आयोग के गठन से दिया है। यह पहला प्रयास है। इससे क्या बदलाव आएगा, इसके बारे में अभी कुछ कह पाना कठिन है लेकिन इसे एक सकारात्मक पहल के तौर पर देखा जाना चाहिए। इन सवालों को अब सिर्फ सवाल जे तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि इसे ग्रामीण विकास के अवसर के तौर पर देखा जाना चाहिए। जहाँ तक मजदूरो के रोजगार का सवाल है तो हमे यह अच्छी तरह पता है कि भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था कृषि आधारित है और कृषि में इतने तरह के कार्य हैं कि उसमें अधिकतम लोगों को रोजगार दिया जा सकता है और पहले भी दिया जाता रहा है। एजी ग्रामीण अर्थव्यवस्था पहले जैसी नहीं है। बहुत बदलाव हुआ है। अनेक आयाम खुले हैं। सरकार के स्तर पर भी कृषि कार्य को बढ़ावा देने के लिए अनेक तरह की योजनाएँ लायी गई हैं। इसलिए ग्रामीण भारत में कृषि के अतिरिक्त भी अनेक ऐसे क्षेत्र बने हैं जहां रोजगार की अपर संभावनाएं पैदा हुई हैं।
यहाँ इस बात को गंभीरता से समझने की जरूरत है कि अब ग्रामीण भारत की तस्वीर अनेक स्तरों पर बदल चुकी है। परिवहन के साथ अन्य संसाधनों में बड़े पैमाने पर वृद्धि हुई है, जिससे ग्रामीण भारत का उत्पादन आसानी से शहरों के साथ-साथ दूसरे देशों में भी पहुँच रहा है। सरकार की ओर से भी गाँवों में रहने वाले मजदूरों के लिए अनेक तरह की योजनाएं चलाई जा रही हैं जिसका लाभ गाँव आए इन मजदूरों को भी मिलेगा। मनरेगा के तहत ग्रामीण भारत में रोजगार गारंटी की योजना पिछले कई वर्षों से चल रही है। वहीं खाद्यान्न वितरण से भी गाँव में रहने वाले मजदूरों का जीवन बहुत आसान हुआ है। पिछले पाँच-छः वर्षों में बड़े पैमाने पर आवास, शौचालय, बिजली और उज्जवला के तहत गैस कनेक्सन देकर सरकार ने ग्रामीण जीवन की तस्वीर को लगभग बदल दिया है।
इन सारी परिस्थितियों को देखते हुए यह कहना गलत नहीं होगा कि गाँव आए मजदूरों को लेकर फिलहाल ऐसी कोई बड़ी परेशानी दिखाई नहीं दे रही। आगे की स्थिति कैसी होगी यह समय तय करेगा। लेकिन एक बात तय है कि ग्रामीण भारत भी अब हर तरह से रोजगारोन्मुख हो गया है और ऐसे अनेक क्षेत्र सृजित हुए हैं जहाँ बड़े पैमाने पर रोजगार के अवसर उपलब्ध हुए हैं। इस महामारी ने गांवों को एक बार फिर से अपनी ताकत का एहसास कराने का अवसर प्रदान किया है। यदि सरकार की ओर से ग्रामीण और कृषि विकास की योजनाओं को थोड़ा और विस्तार दे दिया जाय तो गाँव सिर्फ मजदूरों को रोजगार ही मुहैया नहीं कराएंगे, अपितु भारतीय अर्थव्यवस्था को मजबूती प्रदान करने में भी बड़ी भूमिका निभायेंगे।

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